गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

कल्पान्त ध्यान साधना द्वितीय क्रिया

कल्पान्त ध्यान साधना द्वितीय क्रिया

द्वितीय क्रिया - : आप अब लगातार प्रथम क्रिया कर रहे है । ओर आपको बहुत से अनुभव भी हो रहे है। कुछ आत्मजनो को बहुत अच्छे अनुभव हो रहे है। कुछ को कम, पर अनुभव सब कर रहे है। कुछ के शारिरिक रोग कम हो रहे है तो कुछ के। मानसिक रोग, ओर कुछ को आनंद की हल्की सी अनुभूति हुई है, पर कुछ को कुछ समस्याऐ भी आ रही है क्योकि आप पहली बार कुछ अलग कर रहै है जिसमे आपको कुछ करना नही होता है। परन्तु आपकी प्रत्येक समस्या का व जिज्ञासा का पर्सनल समाधान Whatsapp पर किया जा रहा है। अब आप थोड़ा सा आगे बढ़ रहे है द्वितिय क्रिया के लिये , इसमे आपको तेजी से अनुभव होगें।ओर आधिक गहराईयो मे पहुँचकर पहले से हजारो गुना ज्यादा आंनद की अनुभुतियां  प्राप्त होगी। इसमे आपको प्रथम क्रिया को ही करना है पर तीन संकल्पओ को साथ में जोड़ना है
             आपको सबसे पहले एक जगह व समय तय करना है जहाँ आप बिना Disturbing के यह सब कर सके। अब आपको एकही जगह पर खडे होकर जोगिंग शुरू करनी है। 5-15 मिनट तक आप दौड़ सकते है। जिसकी जितनी क्षमता हो उतना करें , जब दौड़ना बस की न रहे तो आप पीठ के बल लेट जाइए और दोनों भुजाओं को शरीर के बगल में रखिए, दोनों हाथ शरीर से 6 इंच दूरी पर हो , तथा हथेलियां उपर की ओर खुली रखें। पैरों को एक दूसरे से थोड़ा दूर कर लें और आखों को बंद कर लीजिए। इसके बाद शरीर को ढीला छोड़ दीजिए।
                   साधना के दूसरा चरण मे प्रवेश करें इसमे आपको तीन संकल्प करने है। प्रथम संकल्प के लिए गहरा श्वास भरे रोके ओर दोहराये कि मे आँख नही खोलूंगा या खोलूंगी,ओर श्वास को निकाल दें, इसे तीन बार करे। फिर दूसरे संकल्प के लिए श्वास भरे रोके ओर दोहरये कि मे मुख से नहीं बोलूंगा या बोलूंगी, ओर श्वास निकाल दें। तीन बार इसे भी दोहराये। इसी प्रकार तीसरे संकल्प के लिए श्वास भरे रोके ओर दोहराये कि मे अब शरीर को नही हिलाऊगा या हिलाऊगी ओर श्वास निकाल दें। इसे भी तीन बार दोहराये। ध्यान रहे इनमे तीसरा संकल्प सबसे महत्वपूर्ण है, पूरी साधना इसी संकल्प पर टिकी हुई है। इस प्रकार पूरी आत्म शक्ति के साथ यह  संकल्प करे ओर तीसरे चरण मे प्रवेश करें। इस अवस्था में ये ध्यान रखिए कि आपको कुछ करना नहीं है ओर कुछ भी हो जाये आपको शरीर को हिलाना नही है।
                       आते हुए विचारों को रोकना नहीं है, ओर आपको किसी विचार पर कोई प्रतिक्रिया भी नहीं करनी है , जो महसूस हो उसे करते रहे पर आपनी बुद्बि का प्रयोग बिलकुल न करें न कुछ करने की कोशिश करें न ही ना करने की , आपको बस आँख बन्द करके लेटे रहना है अगर खुद कुछ हो तो उसे केवल महसूस करना है नहीं तो कुछ नही। 45-60 मिनिट आपको बस ऐसे ही लेटे रहना है। कुछ नही करना है। कभी भी जब समय मिले तब करें, कोई समय न हो तो केवल रात को सोने से पहले करे, जब क्रिया को बन्द करना हो चेतना मे वापस आना हो तो पहले दो गहरी श्वास भरे , हाथ पैर की अंगूलीयो मे हलचल करे, फिर हथेलीयों को रगड़ कर गर्म करें, आँखों पर लगाए, चेहरे पर लगाए, ओर धीरे धीरे आँखें खोलते हुये उठकर बैठ जाये।                                                                                     कोई नियम नही है। कोई बन्धन नही है। पूर्ण स्वतंत्र होकर करें, क्या होगा या कुछ होगा या नही यह न सोचे, बस करें, ओर जिसको कोई अनुभव हो वो पर्सनल मे मैसेज करें, ओर सभी को अपना अनुभव बताते रहना है । जिससे आपका सही मार्गदर्शन कर सकू
                     अगली क्रिया 40-120 दिन के अन्दर मिलेगी तब तक इसको करते रहै। अगर किसी को कुछ समझ न आया हो , कोई शंका हो, तो पर्सनल फोन करके पूछ ले, या मेरे पर्सनल नम्बर पर whatsapp  मैसेज करके पूछ ले,
ऊँ परमात्मा आपको सफलता दे। ओर जो भी सोचकर जो क्रिया को करै वो उसे प्राप्त हो , इसी शुभ आशीष के साथ स्वामी जगतेश्वर आनंद जी

कल्पान्त ध्यान साधना

कल्पान्त ध्यान साधना
ध्यान क्या है। :- ध्यान एक ऐसी कला है जो पूर्णताः विज्ञानिक है। इसमे विस्वास नहीं करना है, न ही विस्वास करने की जरुरत है। उसे केवल ओर केवल करने की जरूरत है। बस तुम उसे करों ओर उसे केवल करके ही जाना जा सकता है। एक ऐसा परम आनंद जो आपको आनंद की सीमाओ से पार ले जाये, एक ऐसी शान्ति जो अन्नत गहरी हो, जहाँ सब कुछ शान्त हो जाता हो, जहाँ फिर कोई भी चाहत बाकी नहीं रहती, ओर जहाँ पहुँचकर फिर सभी दौड़ पूरी हो जाती हैं। वह अवस्था ध्यान की अवस्था हैं।ध्यान हमें उस परम आनंद तक ले जाता है जिसकी हम केवल कल्पना करते है। ओर जब उस आनंद को हम प्रकट कर लेते है तो उसकी व्याख्या शब्दों मे नही कर सकते, इसलिये ध्यान का अनुभव पढ़कर नही केवल करके ही पाया जा सकता है।ध्यान को करने से तुम्हारे भीतर अदभुत प्रेम सौन्दर्य फुटने लगता है। तुम नाचने उठोगें, गाने लगोगें, तुम एक ऐसे प्रेमी बन जाओगे कि सारी सृष्टि ही प्रेममय दिखाई देने लगेगी, ओर यह सब करके ही प्रकट होगा। बस यही ध्यान है।

आज से कल्पान्त साधना की श्रखला शुरू हो रही है। इसको शुरू करने से पहले यह समझ ले कि यह साधना कोई क्रिया नही है। ओर मे आपको बहुत सहज तरीकों से ध्यान की उन गहराइयो मे ले जाऊगा जिसकी केवल आपने अब तक कल्पना की है। इसके लिए आपको आपनी बुद्वि का प्रयोग बन्द करना है ओर जो मे कहूँ उसको करना शुरू करना है। ओर आपको जो भी अनुभव हो उनको मेरे पर्सनल नम्बर पर ही बताएं, ग्रुप मे नहीं । क्योंकि सबको अपने कर्मो, संस्कारों, मान्यताओं, के अधार के कारण अलग अलग अनुभव होगे। कुछ लोग बहुत तेजी से अनुभव करेंगे कुछ लम्बे समय तक करने के बाद अनुभव करेंगे। ओर आपके अनुभव ही आपका आगे का रास्ता बनायेंगे। अर्थात सबका रास्ता एक तो होगा परन्तु कोई पहले कोई बाद मे पायेगा, इसलिये जो तेजी से आगे बढ़ेगे उन्हें फिर आगे का रास्ता पर्सनल ही दे दूगा।
इसलिये सभी एक बार फिर समझ ले कि ग्रुप मे कोई भी मैसेज न करे , सभी सवाल व अनुभव पर्सनल नम्बर पर ही करें । ओर एक बात आप इस ग्रुप मे जुड़े है तो मेरे बताये रास्ते पर चले जरूर ओर जो न चलना चाहे वो कभी भी ग्रुप छोड़ सकता है।


प्रथम क्रिया- आपको सबसे पहले एक जगह व समय तय करना है जहाँ आप बिना Disturbing के यह सब कर सके। अब आपको एकही जगह पर खडे होकर जोगिंग शुरू करनी है। 5-15 मिनट तक आप दौड़ सकते है। जिसकी जितनी क्षमता हो उतना करें , जब दौड़ना बस की न रहे तो आप पीठ के बल लेट जाइए और दोनों भुजाओं को शरीर के बगल में रखिए, दोनों हाथ शरीर से 6 इंच दूरी पर हो , तथा हथेलियां उपर की ओर खुली रखें। पैरों को एक दूसरे से थोड़ा दूर कर लें और आखों को बंद कर लीजिए। इसके बाद शरीर को ढीला छोड़ दीजिए। इस अवस्था में ये ध्यान रखिए कि आपको कुछ करना नहीं है ओर कुछ भी हो जाये आँखों को बन्द रखना है ओर कुछ नही करना करना है
आते हुए विचारों को रोकना नहीं है, ओर आपको किसी विचार पर कोई प्रतिक्रिया भी नहीं करनी है , जो महसूस हो उसे करते रहे पर आपनी बुद्बि का प्रयोग बिलकुल न करें न कुछ करने की कोशिश करें न ही ना करने की , आपको बस आँख बन्द करके लेटे रहना है अगर खुद कुछ हो तो उसे केवल महसूस करना है नहीं तो कुछ नही। 15-30 मिनिट आपको बस ऐसे ही लेटे रहना है। कुछ नही करना है। कभी भी जब समय मिले तब करें, कोई समय न हो तो केवल रात को सोने से पहले करे, जब क्रिया को बन्द करना हो चेतना मे वापस आना हो तो पहले दो गहरी श्वास भरे , हाथ पैर की अंगूलीयो मे हलचल करे, फिर हथेलीयों को रगड़ कर गर्म करें, आँखों पर लगाए, चेहरे पर लगाए, ओर धीरे धीरे आँखें खोलते हुये उठकर बैठ जाये। कोई नियम नही है। कोई बन्धन नही है। पूर्ण स्वतंत्र होकर करें, क्या होगा या कुछ होगा या नही यह न सोचे, बस करें, ओर जिसको कोई अनुभव हो वो पर्सनल मे मैसेज करें, नही तो जब तक करते रहे जब तक आगे की क्रिया न डालू,
अगली क्रिया 11-21 दिन के अन्दर मिलेगी तब तक इसको करते रहै। अगर किसी को कुछ समझ न आया हो , कोई शंका हो, तो पर्सनल फोन करके पूछ ले, या मेरे पर्सनल नम्बर पर whatsapp  मैसेज करके पूछ ले,
ऊँ परमात्मा आपको सफलता दे। ओर जो भी सोचकर जो क्रिया को करै वो उसे प्राप्त हो , इसी शुभ आशीष के साथ स्वामी जगतेश्वर आनंद जी

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

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सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

बीमारी क्या है? स्वास्थ्य क्या है?

बीमारी क्या है? स्वास्थ्य क्या है?

औषधिशास्त्र, मेडिसिन--आदमी की ऊपर से बीमारियों को पकड़ता है। मेडिटेशन, ध्यान का शास्त्र--आदमी को गहराई से पकड़ता है। इसे ऐसा कह सकते हैं कि औषधि मनुष्य को ऊपर से स्वस्थ करने की चेष्टा करती है। ध्यान मनुष्य को भीतर से स्वस्थ करने की चेष्टा करता है। न तो ध्यान पूर्ण हो सकता है औषधिशास्त्र के बिना और न औषधिशास्त्र पूर्ण हो सकता है ध्यान के बिना। असल में आदमी चूंकि दोनों है--भाषा ठीक नहीं है यह कहना कि आदमी दोनों है, क्योंकि इसमें कुछ बुनियादी भूल हो जाती है।

मनुष्य हजारों वर्षों से इस तरह सोचता रहा है कि आदमी का शरीर अलग है और आदमी की आत्मा अलग है। इस चिंतन के दो खतरनाक परिणाम हुए। एक परिणाम तो यह हुआ कि कुछ लोगों ने आत्मा को ही मनुष्य मान लिया, शरीर की उपेक्षा कर दी। जिन कौमों ने ऐसा किया उन्होंने ध्यान का तो विकास किया, लेकिन औषधि का विकास नहीं किया। वे औषधि का विज्ञान न बना सके। शरीर की उपेक्षा कर दी गई। ठीक इसके विपरीत कुछ कौमों ने आदमी को शरीर ही मान लिया और उसकी आत्मा को इनकार कर दिया। उन्होंने मेडिसिन और औषधि का तो बहुत विकास किया, लेकिन ध्यान के संबंध में उनकी कोई गति न हो पाई। जब कि आदमी दोनों है एक साथ। कह रहा हूं कि भाषा में थोड़ी भूल हो रही है, जब हम कहते हैं--दोनों है एक साथ, तो ऐसा भ्रम पैदा होता है कि दो चीजें हैं जुड़ीं हुई।


नहीं, असल में आदमी का शरीर और आदमी की आत्मा एक ही चीज के दो छोर हैं। अगर ठीक से कहें तो हम यह नहीं कह सकते कि बॉडी-सोल, ऐसा आदमी है। ऐसा नहीं है। आदमी साइकोसोमेटिक है, या सोमेटोसाइकिक है। आदमी मनस-शरीर है, या शरीर-मनस है।

मेरी दृष्टि में, आत्मा का जो हिस्सा हमारी इंद्रियों की पकड़ में आ जाता है उसका नाम शरीर है और आत्मा का जो हिस्सा हमारी इंद्रियों की पकड़ के बाहर रह जाता है उसका नाम आत्मा है। अदृश्य शरीर का नाम आत्मा है, दृश्य आत्मा का नाम शरीर है। ये दो चीजें नहीं हैं, ये दो अस्तित्व नहीं हैं, ये एक ही अस्तित्व की दो विभिन्न तरंग-अवस्थाएं हैं।

असल में दो, द्वैत, डुआलिटी की धारणा ने मनुष्य-जाति को बड़ी हानि पहुंचाई। सदा हम दो की भाषा में सोचते रहे और मुसीबत हुई। पहले हम सोचते थे: मैटर और एनर्जी। अब हम ऐसा नहीं सोचते। अब हम यह नहीं कहते कि पदार्थ अलग और शक्ति अलग। अब हम कहते हैं, मैटर इज़ एनर्जी। अब हम कहते हैं, पदार्थ ही शक्ति है। सच तो यह है कि यह पुरानी भाषा हमें दिक्कत दे रही है। पदार्थ ही शक्ति है, ऐसा कहना भी ठीक नहीं है। कुछ है, एक्स, जो एक छोर पर पदार्थ दिखाई पड़ता है और दूसरे छोर पर एनर्जी, शक्ति दिखाई पड़ता है। ये दो नहीं हैं। ये एक ही ऊर्जा, एक ही अस्तित्व के दो छोर हैं।

ठीक वैसे ही आदमी का शरीर और उसकी आत्मा एक ही अस्तित्व के दो छोर हैं। बीमारी दोनों छोरों में किसी भी छोर से शुरू हो सकती है। शरीर के छोर से शुरू हो सकती है और आत्मा के छोर तक पहुंच सकती है। असल में जो शरीर पर घटित होता है, उसके वाइब्रेशंस, उसकी तरंगें आत्मा तक सुनी जाती हैं।

इसलिए कई बार यह होता है कि शरीर से बीमारी ठीक हो जाती है और आदमी फिर भी बीमार बना रह जाता है। शरीर से बीमारी विदा हो जाती है और डॉक्टर कहता है कि कोई बीमारी नहीं है और आदमी फिर भी बीमार रह जाता है और बीमार मानने को राजी नहीं होता कि मैं बीमार नहीं हूं। चिकित्सक के जांच के सारे उपाय कह देते हैं कि अब सब ठीक है, लेकिन बीमार कहे चला जाता है कि सब ठीक नहीं है। इस तरह के बीमारों से डॉक्टर बहुत परेशान रहते हैं, क्योंकि उनके पास जो भी जांच के साधन हैं वे कह देते हैं कि कोई बीमारी नहीं है।

लेकिन कोई बीमारी न होने का मतलब स्वस्थ होना नहीं है। स्वास्थ्य की अपनी पाजिटिविटी है। कोई बीमारी का न होना सिर्फ निगेटिव है। हम कह सकते हैं कि कोई कांटा नहीं है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि फूल है। कांटा नहीं है, इससे सिर्फ इतना ही पता चलता है कि कांटा नहीं है। लेकिन फूल का होना कुछ बात और है।

लेकिन चिकित्सा-शास्त्र अब तक, स्वास्थ्य क्या है, इस दिशा में कुछ भी काम नहीं कर पाया है। उसका सारा काम इस दिशा में है कि बीमारी क्या है। तो अगर चिकित्सा-शास्त्र से हम पूछें--बीमारी क्या है? तो वह परिभाषा करता है, डेफिनीशन करता है। उससे पूछें कि स्वास्थ्य क्या है? तो वह धोखा देता है। वह कहता है, जब कोई बीमारी नहीं होती तो जो शेष रह जाता है वह स्वास्थ्य है। यह धोखा हुआ, यह परिभाषा नहीं हुई। क्योंकि बीमारी से स्वास्थ्य की परिभाषा कैसे की जा सकती है? यह तो वैसे ही हुआ जैसे कांटों से कोई फूल की परिभाषा करे। यह तो वैसे ही हुआ जैसे कोई मृत्यु से जीवन की परिभाषा करे। यह तो वैसे ही हुआ जैसे कोई अंधेरे से प्रकाश की परिभाषा करे। यह तो वैसे ही हुआ जैसे कोई स्त्री से पुरुष की परिभाषा करे या पुरुष से स्त्री की परिभाषा करे।

नहीं, चिकित्सा-शास्त्र अब तक नहीं कह पाया--व्हाट इज़ हेल्थ? स्वास्थ्य क्या है? वह इतना ही कह सकता है--व्हाट इज़ डिज़ीज? बीमारी क्या है? स्वभावतः, उसका कारण है। उसका कारण यही है कि चिकित्सा-शास्त्र बाहर से पकड़ता है। बाहर से बीमारी ही पकड़ में आती है। वह जो भीतर है मनुष्य का आंतरिक अस्तित्व, वह जो इनरमोस्ट बीइंग, वह जो भीतरी आत्मा, स्वास्थ्य सदा वहीं से पकड़ा जा सकता है।

इसलिए हिंदी का स्वास्थ्यशब्द बहुत अदभुत है। अंग्रेजी का हेल्थशब्द स्वास्थ्यका पर्यायवाची नहीं है। हेल्थ तो हीलिंग से बना है, उसमें बीमारी जुड़ी है। हेल्थ का तो मतलब है हील्ड--जो बीमारी से छूट गया। स्वास्थ्य का मतलब यह नहीं है कि जो बीमारी से छूट गया। स्वास्थ्य का मतलब है जो स्वयं में स्थित हो गया--दैट वन हू हैज रीच्ड टु हिमसेल्फ, वह जो अपने भीतर गहरे से गहरे में पहुंच गया। स्वस्थ का मतलब है, स्वयं में जो खड़ा हो गया। इसलिए स्वास्थ्य का मतलब हेल्थ नहीं है।

असल में दुनिया की किसी भाषा में स्वास्थ्य के मुकाबले कोई शब्द नहीं है। दुनिया की सभी भाषाओं में जो शब्द है वे डिज़ीज या नो-डिज़ीज के पर्यायवाची हैं। स्वास्थ्य की धारणा ही हमारे मन में बीमार न होने की है। लेकिन बीमार न होना जरूरी तो है स्वस्थ होने के लिए, पर्याप्त नहीं है; इट इज़ नेसेसरी बट नॉट इनफ--कुछ और भी चाहिए।

वह दूसरे छोर पर वह जो हमारे भीतर हमारा अस्तित्व है, वहां से कुछ हो सकता है। बीमारी बाहर से शुरू हो, तो भी भीतर तक उसकी प्रतिध्वनियां पहुंच जाती हैं। अगर मैं शांत झील में एक पत्थर फेंक दूं, तो जहां पत्थर गिरता है, चोट वहीं पड़ती है, लेकिन तरंगें दूर झील के तटों तक पहुंच जाती हैं, जहां पत्थर कभी नहीं पड़ा।

ठीक जब हमारे शरीर पर कोई घटना घटती है, तो तरंगें आत्मा तक पहुंच जाती हैं। और अगर चिकित्सा-शास्त्र सिर्फ शरीर का इलाज कर रहा है, तो उन तरंगों का क्या होगा जो दूर तट पर पहुंच गईं? अगर हमने पत्थर फेंका है झील में और हम उसी जगह पर केंद्रित हैं जहां पत्थर गिरा और पानी में गड्ढा बना, तो उन तरंगों का क्या होगा जो कि पत्थर से मुक्त हो गईं, जिनका अपना अस्तित्व शुरू हो गया?

जब एक आदमी बीमार पड़ता है तो शरीर चिकित्सा के बाद भी बीमारी से पैदा हुई तरंगें उसकी आत्मा तक प्रवेश कर जाती हैं। इसलिए अक्सर बीमारी लौटने की जिद्द करती है। बीमारी की लौटने की जिद्द उन तरंगों से पैदा होती है जो उसकी आत्मा के अस्तित्व तक गूंज जाती हैं और जिनका चिकित्सा-शास्त्र के पास अब तक कोई उपाय नहीं है। इसलिए चिकित्सा-शास्त्र बिना ध्यान के सदा ही अधूरा रहेगा। हम बीमारी ठीक कर देंगे, बीमार को ठीक न कर पाएंगे। वैसे डाक्टर के हित में है यह कि बीमार ठीक न हो। बीमारी भर ठीक होती रहे, बीमार लौटता रहे!

दूसरा जो छोर है, वहां से भी बीमारी पैदा हो सकती है। सच तो यह है कि मैंने कहा कि वहां बीमारी है ही, जैसे मनुष्य है। जैसा मनुष्य है, वहां एक टेंशन है ही भीतर। जैसा मैंने कहा कि कोई पशु इस तरह डिस-ईज्ड नहीं है, इस तरह रेस्टलेस नहीं है, इस तरह बेचैन और तनाव में नहीं है। उसका कारण है--कि किसी पशु के मस्तिष्क में बिकमिंग का, होने का कोई खयाल नहीं है। कुत्ता कुत्ता है। उसे होना नहीं है। आदमी को आदमी होना है, है नहीं। इसलिए हम किसी कुत्ते से यह नहीं कह सकते कि तुम थोड़े कम कुत्ते हो। सब कुत्ते बराबर कुत्ते होते हैं। लेकिन किसी आदमी से संगत रूप से कह सकते हैं कि आप थोड़े कम आदमी हैं।

आदमी पूरा पैदा नहीं होता। आदमी का जन्म अधूरा है। सब जानवर पूरे पैदा होते हैं। आदमी अधूरा पैदा होता है। कुछ काम है जो उसे करना पड़ेगा, तब वह पूरा हो सकता है। वह जो पूरा न होने की स्थिति है, वह उसकी डिज़ीज़ है। इसलिए वह चैबीस घंटे परेशान है।

ऐसा नहीं है, आमतौर से हम सोचते हैं कि एक गरीब आदमी परेशान है, क्योंकि गरीबी है। लेकिन हमें पता नहीं कि अमीर होने से परेशानी का तल बदलता है, परेशानी नहीं बदलती। सच तो यह है कि गरीब इतना परेशान कभी होता ही नहीं जितना अमीर परेशान हो जाता है। क्योंकि गरीब को एक तो जस्टीफिकेशन होता है परेशानी का--कि मैं गरीब हूं। अमीर को वह जस्टीफिकेशन भी नहीं रह जाता। अब वह कारण भी नहीं बता सकता कि मैं परेशान क्यों हूं? और जब परेशानी अकारण होती है, तब परेशानी भयंकर हो जाती है। कारण से राहत मिलती है, कंसोलेशन मिलता है, क्योंकि कारण से यह भरोसा होता है कि कल कारण को अलग भी कर सकेंगे। लेकिन जब कोई बीमारी अकारण खड़ी हो जाती है तब कठिनाई शुरू हो जाती है।

इसलिए गरीब मुल्कों ने बहुत दुख सहे हैं; जिस दिन वे अमीर होंगे उस दिन उनको पता चलेगा कि अमीर मुल्कों के अपने दुख हैं। हालांकि मैं पसंद करूंगा, गरीब के दुख की बजाय अमीर का दुख ही चुनने योग्य है। जब दुख ही चुनना हो तो अमीर का ही चुनना चाहिए। लेकिन तीव्रता बेचैनी भी बढ़ जाएगी। आदमी परेशान है। वह नई परेशानी खोज लेता है। वह जो उसके भीतर एक अस्तित्व है, वह चैबीस घंटे मांग कर रहा है उसकी जो नहीं है। जो है, वह रोज बेकार हो जाता है। जो मिल जाता है, वह बेकार हो जाता है। जो नहीं है, वह आकर्षित करता है। वह जो नहीं है, उसको पाने की निरंतर चेष्टा है।

इस पूरे होने की आतुरता से सारे धर्म पैदा हुए। और यह जानना उपायोगी होगा कि एक दिन धर्मगुरु और चिकित्सक पृथ्वी पर एक ही आदमी था। धर्मगुरु ही चिकित्सक था, पुरोहित ही चिकित्सक था। वह जो प्रीस्ट था, वही डाक्टर था। और आश्चर्य न होगा कि कल फिर स्थिति वही हो जाए। थोड़ा सा फर्क होगा। अब जो चिकित्सक होगा वही पुरोहित हो सकता है! सवाल सिर्फ शरीर का नहीं है। बल्कि यह भी साफ होना शुरू हो गया है कि अगर शरीर बिलकुल स्वस्थ हुआ तो मुसीबतें बहुत बढ़ जाएंगी, क्योंकि पहली दफे भीतर के छोर पर जो रोग हैं, उनका बोध शुरू हो जाएगा।

हमारे बोध के भी तो कारण होते हैं। अगर मेरे पैर में कांटा गड़ा होता है तो मुझे पैर का पता चलता है। जब तक कांटा पैर में न हो, पैर का पता नहीं चलता। और जब पैर में कांटा होता है तो मेरी पूरी आत्मा एरोड हो जाती है, तीर बन जाती है पैर की तरफ। वह सिर्फ पैर को ही देखती है, कुछ और नहीं देखती--स्वाभाविक। लेकिन पैर से कांटा निकल जाए, फिर भी आत्मा कुछ तो देखेगी। भूख कम हो जाए, कपड़े ठीक मिल जाएं, मकान व्यवस्थित हो जाए, जो पत्नी चाहिए वह मिल जाए आदि-आदि 


मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

प्राकर्ति ही उपचारक है

प्राकर्ति ही उपचारक है। 

प्रत्येक मनुष्य के अन्दर एक अद्भुत शक्ति होती है। जिससे वह जीवन यापन करता है। ओर जब तक वो शक्ति काम करती है, हम स्वास्थ्य रहेते है। इस शक्ति को ईस्वर, परमात्मा, आत्मा, आदि नमो से जाना जाता है। वोही हमारे शरीर को चलती है, रोगी करती है, ओर फिर स्वाश्थ्य प्रदान करती है।
जब हमारी गलत आदतों की वजह से व अप्राकृतिक आहार के कारण शरीर में विजातीय तत्व जमा हो जाते है, तो प्राकृति स्वयं उनको निकलकर उपचार करती है। अगर हम प्राकृति के कार्यो में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं डाले तो वह हमारे शरीर को स्वस्थ कर देती है।



कोई भी दवा रोगी को ठीक नहीं करती है। ठीक तो प्राकृति को ही करना होता है। जब हड्डी टूट जाती है, तो एक जगह रोकने से फिर से जुड जाती है। ऐसे ही जब पेट खराब होता है, तो दस्त या उल्टी लगती है, ओर पेट सही हो जाता है। इस प्रकार सभी रोंगों का उपचार प्राकृति खुद करती है। हमको केवल प्राकृति के उपचार के तरीके को समझकर उसका सहयोग करना मात्र है, ओर जेसे ही हम उसके उपचार में सहयोग करते है हम निरोगी हो जाते है। इस प्रकार जिसको हम रोंग कहेते है वो प्राकृति का उपचार है।