मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

प्राकर्ति ही उपचारक है

प्राकर्ति ही उपचारक है। 

प्रत्येक मनुष्य के अन्दर एक अद्भुत शक्ति होती है। जिससे वह जीवन यापन करता है। ओर जब तक वो शक्ति काम करती है, हम स्वास्थ्य रहेते है। इस शक्ति को ईस्वर, परमात्मा, आत्मा, आदि नमो से जाना जाता है। वोही हमारे शरीर को चलती है, रोगी करती है, ओर फिर स्वाश्थ्य प्रदान करती है।
जब हमारी गलत आदतों की वजह से व अप्राकृतिक आहार के कारण शरीर में विजातीय तत्व जमा हो जाते है, तो प्राकृति स्वयं उनको निकलकर उपचार करती है। अगर हम प्राकृति के कार्यो में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं डाले तो वह हमारे शरीर को स्वस्थ कर देती है।



कोई भी दवा रोगी को ठीक नहीं करती है। ठीक तो प्राकृति को ही करना होता है। जब हड्डी टूट जाती है, तो एक जगह रोकने से फिर से जुड जाती है। ऐसे ही जब पेट खराब होता है, तो दस्त या उल्टी लगती है, ओर पेट सही हो जाता है। इस प्रकार सभी रोंगों का उपचार प्राकृति खुद करती है। हमको केवल प्राकृति के उपचार के तरीके को समझकर उसका सहयोग करना मात्र है, ओर जेसे ही हम उसके उपचार में सहयोग करते है हम निरोगी हो जाते है। इस प्रकार जिसको हम रोंग कहेते है वो प्राकृति का उपचार है।

प्राकर्तिक चिकित्सा

भारत मे पहली बार  प्राकर्तिक चिकित्सा का सर्टिफिकेट कोर्स
स्वास्थ्य क्रांति -: आज 21वीं सदी का एक दशक बीत चुका है। आने वाला समय जरूरी है, स्वास्थ्य क्रांति के लिए, स्वास्थ रहने की इच्छा प्रत्येक व्यक्ति में होती है। और हम स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता के शुरुआती दौर में हैं। क्योंकि अधिकांश लोग यह नहीं जानते कि हम जो पसंद कर रहे हैं, वह हमारे शरीर पर व स्वास्थ्य पर क्या असर डाल रहा है, और जो हमें लाभकारी है, वह क्या है। हम वही स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता लाने जा रहे हैं। हम लोगों को उनके स्वास्थ्य के प्रति सहयोगी प्राकृतिक उपचार, खानपान, दिनचर्या, रात्रि चर्या, आदि को इस कोर्स के द्वारा विस्तार से बताएंगे। साथ ही साथ हम उन गलतियों का भी एहसास कराएंगे, जिसके कारण हमारा शरीर रोगी होता जा रहा है। हम बीमार कैसे हो रहे हैं। ओर कैसे हम दीर्घ स्वास्थ्य प्राप्त कर सकते हैं। यह सब इस कोर्स में बताएंगे।

आज हम इस युग में एक नई स्वास्थ्य क्रांति करने जा रहे हैं। जिसमें आप शामिल होकर अग्रणी भूमिका निभाऐगें। आज सरकार स्वास्थ्य पर एक अच्छा खासा बजट देती है। परंतु क्या वह स्वास्थ्य पर खर्च हो रहा है। यह सोचनीय विषय है। जो खर्च हम बीमार होने पर स्वस्थ होने के लिए कर रहे हैं, वह स्वस्थ रहने पर (रोगी ही न हो पर) क्यों नहीं कर रहे। आज स्वास्थ्य के नाम पर किया जाने वाला खर्च बीमारीयों पर सामान्य से कैंसर तक प्रतिक्रियात्मक उत्पाद एवं सेवाएं उपलब्ध कराना है। यह उत्पाद बीमारी के लक्षणों को खत्म करते हैं या फिर दवा देते हैं। परन्तु बीमारी खत्म नही हो पाती ओर दवाईयां बन्द करने के कुछ समय बाद दुबारा वही लक्षण पैदा हो जाते है। या फिर कुछ रोंगो मे (मधुमेह, बीपी, ह्रदय रोंगो में) हम जीवन भर दवाईयां खाते है ओर रोंग खत्म होने की जगह बढ़ते जाते है। साथ-साथ दवाईयां भी बढ़ती जाती है।


परंतु आज जरूरत है ऐसे स्वास्थ्य, ऐसे उत्पाद, और सेवाओं की जिससे हम बीमार ही ना पड़े। हमारी बढ़ती उम्र का असर धीमा हो जाए, और कोई भी बीमारी शुरुआती दौर में ही खत्म हो जाए। यह तभी संभव है, जब हमें पता हो, कि बीमारी कैसे पैदा हो रही है। हम कैसे उसको रोक सकते हैं। कैसे हम उससे बच सकते हैं। वह कौन से तरीके हैं, जो जीवन को आरामदायक एवं आनंदित बना सकते हैं। जिनसे हम जीवन की गुणवत्ता व दीर्घ आयु प्राप्त कर सकते है।
बीमा कंपनियां भी आज स्वास्थ्य बीमा कर रही हैं। कि अगर बीमार हो गए, तो पैसा हम देंगे, नई-नई दवाइयों के आने से क्या रोग रुक रहे हैं। आज जितने हास्पिटल बढ़ रहे हैं, उतने ही मरीज भी तैयार हो रहे हैं क्यों, क्योंकि हम बीमारी के बाद स्वास्थ्य के बारे में सोचते हैं। स्वस्थ रहने पर उसे स्थाई रखने की कोशिस नही करते, और जानबूझकर उसे बिगड़ने देते हैं। या यूं कहें कि रोगों का पता हमें शुरू से होता है। जब रोग पहली दस्तक देता है। तो हम जानते हैं कि शरीर में कुछ असहज हो रहा है। परंतु हम उस असहजता को नजरअंदाज करते जाते हैं। और जब वह रोंग बड़ा बनकर उभरता है। तो ठीक होना चाहते हैं क्यों। क्योंकि हमें जानकारी नहीं है। यही है स्वास्थ क्रांति, कि हम स्वस्थ रहने की ओर अग्रसर हो, ना कि रोगों को ठीक करने के लिऐ।



आज प्राकृतिक चिकित्सा, एक्यूप्रेशर, सुजोक, जल चिकित्सा, मड चिकित्सा, योग चिकित्सा, रेकी हीलिंग, जैसी 150 से भी जायेंदा वैकल्पिक चिकित्सा अपना अस्तित्व बनाने में लगी हुई है। जो मनुष्य को स्वास्थ्य प्रदान कर रही है। लोगों में दिन-प्रतिदिन जागरुकता बढ़ रही है, और यह स्वास्थ्य चेतना भी हमारे जीवन को निश्चित रूप से बदलने में सक्षम होगी। हमें आज जरुरत है पंचतत्व को जानने की, उनके प्रयोग की, हमारा शरीर पूर्ण रूप से पंच तत्वों के सहयोग व ऊर्जा (आत्मा चेतना आदि) के सहयोग से बना है। और उसी की कमी या अधिकता से रोगी भी होता है। हम कोर्स में प्रत्येक तत्व के बारे में विस्तार से जानेंगे और उनकी पूर्ति कैसे करनी है, कमी होने पर क्या क्या रोग होते हैं, अधिक होने पर क्या क्या रोग होते हैं। उनका संतुलन कैसे रख सकते हैं। यदि हमने यह जान लिया तो निश्चित ही हम स्वास्थ्य रक्षक बन जाएंगे स्वयं के भी और दूसरों के भी, इसके लिए आज से ही स्वास्थ्य क्रांति की ओर बड़े और जन स्वास्थ्य रक्षक बने तथा दूसरों को भी स्वास्थ्य के प्रति जागरुक करें यही उद्देश्य है इस स्वास्थय क्रांति का इस प्राकृत चिकित्सा के कोर्स का।

प्राकर्तिक चिकित्सा

भारत मे पहली बार  प्राकर्तिक चिकित्सा का सर्टिफिकेट कोर्स

" कल्पांत रेकी साधना कोर्स की सफलता के बाद अब प्राकर्तिक चिकित्सा में 6 महीने का सर्टिफिकेट कोर्स Whatsapp ओर Hike पर "
हम आपको प्राकर्तिक चिकित्सा का 6 महीने का सर्टिफिकेट कोर्स करा रहे हैं। जिसमे आप स्वयं के डाक्टर बन जाते है। ओर सभी साध्य व असाध्य रोंगों का उपचार बिना दवा के प्राकर्तिक तरीके से कर पायेंगें। आपके लिये कुछ सवाल

1. क्या आपका घर मैडिकल स्टोर बनता जा रहा है ? (हाँ/नही)
2. क्या आपके दिन की शुरूआत दवाईयों से होती है ? (हाँ/नही)
3. क्या आप दवाईयाँ खाकर ठीक नही हो रहें है ? (हाँ/नही)
4. क्या आपके रोग बढ़तें जा रहें है ? (हाँ/नही)
5. क्या आप कम खाते हुए भी मोटे होते जा रहें है ? (हाँ/नही)
6. क्या आपका योग करते हुऐ भी बी पी सन्तुलित नही हो पा रहा है ? (हाँ/नही)
7. क्या आपका तनाव बढ़ता जा रहा है ? (हाँ/नही)
8. क्या तीनो समय खाना खाने के बाद भी आपको कमजोरी महसूस होती है ? (हाँ/नही) 
9. क्या दिन-प्रतिदिन हास्पिटलों व बिमारियों की संख्या बढ़ रही है ? (हाँ/नही
10. क्या दैनिक जीवन में हम जहरीले रसायनों व खाद्वो का प्रयोग कर रहें है ? (हाँ/नही)
11. क्या आज प्रत्येक खाद्व पदार्थो मे मिलावटें बढ़ती जा रही है ? (हाँ/नही)
12. क्या हमारें शरीर को जरूरी पोषक तत्वो (विटामिन,खनिज तत्व,आदि) की पूर्ती नही हो पा रही है ? (हाँ/नही) 
13. क्या आपकी रोग प्रतिरोध क्षमता कम होती जा रही है ? (हाँ/नही)
14. क्या आप कम उम्र मे भी बुड़े नजर आने लगें है ? (हाँ/नही)
15. क्या आपको लगता है कि जिन रोगो सें आप जूझ रहें हे उन्हें ठीक नही कर पायेंगें ? (हाँ/नही) 
16. क्या आप वजन कम करने के प्रति गंभीर है ? (हाँ/नही)
17. क्या आपकी एक अच्छे स्वस्थ मे रूचि है ? (हाँ/नही)
18. क्या आप दवाईयो को जीवन मे कम करना चाहते है ? (हाँ/नही)
19. क्या आप क्रोध, भय, चिन्ता, तनाव से मुक्त व ऊर्जावान जीवन जीना चाहते है ? (हाँ/नही)
20. क्या आपको लगता है कि आप अपने रोगो को ठीक नही कर पायेगे ? (हाँ/नही)
21. क्या आप अपने स्वस्थ को केवल 1 घंण्टा देने के लिऐ तैयार है ? (हाँ/नही)

यदि आपके अधिकतर सवालो का जबाव (हाँ) है। तो आप हमारे प्राकर्तिक चिकित्सा का सर्टिफिकेट कोर्स करें। जिसमे आपको इन सब सवालो के जबाव व अधिक स्वस्थ रहने के तरीको के बारे में जान पायेंगें, ओर आप स्वयं स्वस्थ रहकर परिवार को स्वस्थ रख पायेगें।

आज एलोपैथी के उपचार से हम अपनी जीवनी शक्ति को खोते जा रहे है, ओर इतनी मेडिसन लेते हुए भी स्वस्थ नहीं हो पा रहे है, ओर रोंग ठीक होने की जगह बड़ते जा रहे है, दवाईयां कम होने की जगह निरंतर बढती जा रही है, दवाईयों व रोंगों से छुटकारा पाने के लिये प्राकर्तिक चिकित्सा का कोर्स बनाया गया है, हमारा शरीर पांच पंचतत्व व छठा चेतन तत्व (आत्म तत्व) से मिलकर बना है, ओर इन्ही तत्वों के द्वारा हम शरीर को पूर्ण रूप से स्वस्थ रख सकते है, हमारे शरीर में वो जीवनी शक्ति है जिसके द्वारा हम स्वयं रोंगों को ठीक कर सकते है, प्राकर्तिक चिकित्सा हमें वो जीवन शेली देती है जिससे हम रोंगों को तो ठीक करते ही है साथ ही साथ आने वाले रोंगों से भी बच जाते है, ओर एक बार कोर्स करके आप लाखो रूपये की सर्जरी व दवाईयों से बच जायेंगें।

इस कोर्स में प्राकर्तिक चिकित्सा का इतिहास क्या है, प्राकर्तिक चिकित्सा क्या है, प्राकर्तिक चिकित्सा के सिद्धांत क्या है, पंच तत्व क्या है, उनसे किस प्रकार चिकित्सा की जाती है, असाध्य रोंगों का उपचार बिना दवा के केसे करे, विभिन्न स्त्री, पुरुष, बच्चों के रोंग व सामान्य रोंगों के लक्षण कारण व उपचार, जल तत्व चिकित्सा, वायु तत्व चिकित्सा, आकाश तत्व चिकित्सा, मिटटी तत्व चिकित्सा, अग्नि तत्व चिकित्सा के बारे में विस्तार से जानेंगें। 

यह पूरा कोर्स Whatsapp ओर Hike पर होगा। हम आपको नोट्स भेजेंगे और आपको निरंतर उनको पढ़ना होगा। 6 महीने बाद आपको एक एग्जाम पेपर पीडीऍफ़ में दिया जायेगा उसको हल करके मुझे कोरियर करना होगा, ओर आपको प्राकर्तिक चिकित्सा का सर्टिफिकेट आपके पते पर भेंज दिया जायेंगा। जो आत्मजन कोर्स करना चहाते है उन्है 5100 रू जमा करने होगें। रू जमा करते ही आपको एक फार्म पीडीएफ मे दिया जायेंगा। आपको उसे डाउनलोड कर भरकर तीन फोटो के साथ कोरियर करना होगा। ओर साथ ही आपका कोर्स शुरू कर दिया जायेगा।

कोर्स पूरा होने के बाद जो आत्मजन प्रयोगात्मक ट्रेनिग की इच्छा रखते है उन्हें एक दिवसीय ट्रेनिग हमारे केंद्र कल्पांत सेवाश्रम मुरादनगर गाजियाबाद पर 1000 रू जमा कर प्रदान की जाएगी।

अधिक जानकारी के लिए "9958502499" पर संपर्क करें

हमारा उद्देश्य -:  आज विश्व में एलोपेथिक इलाज की पद्धति, वैज्ञानिक अनुसंधान, निदान तकनीकी और औषधियों (अंग्रेजी) ने यूं तो मृत्यु पर विजय प्राप्त करने का साहस जुटाया है, और आकस्मिक बीमारियों व दुर्घटनाओं के आपातकालीन ईलाज में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को भी साबित किया है। बाल मृत्यु दर को कम किया है। महिलाओं की प्रसव के दौरान होने वाली मृत्यु दर को भी घटाया है। असाध्य और गंभीर रोंगों से शायद एलोपैथी मुक्ति तो नहीं दिला सकी परंतु उस पर नियंत्रण अवश्य प्राप्त किया है। मनुष्य की औसत आयु को बढ़ाने में भी एलोपैथिक औषधिय इलाज लाभदायक सिद्ध हो रहे हैं, वही रोंगों को दीर्घकालिक व आसाध्य बनाने में अपनी नकारात्मक भूमिका अदा करना भी शायद एलोपैथिक चिकित्सक की अपनी मजबूरी है।

खानपान, जीवन शैली के असिमित बदलावों मैं आज मात्र भारतीय नागरिकों को ही नहीं वरन संसार के संपूर्ण मानव जाति को तमाम ऐसे विभिन्न रोगों से ग्रस्त कर लिया है जिसका निदान किसी भी पद्धति मैं नहीं है। जेसे (केंसर व एडस)। दुधारु पशुओं को दिए जाने वाले हार्मोन, पशु चारे में उपलब्ध केमिकल, विषैले रसायन, फल, सब्जी व अन्न में लगी खाद पेस्टिसाइड कीटनाशक, कीटाणुनाशक, फुई फफूंद नासक अपने विषैले साइड इफेक्ट मानव शरीर पर दिन-प्रतिदिन डाल रहे हैं। यातायात के साधन, उच्च शिक्षा, पक्के बहु मंजिला मकान, दो पहिऐ व चार पहिया वाहन और टेलीविजन से जुड़ी विलासिता ने भारतीय शहरी नागरिकों को दिनप्रतिदिन मानव श्रम से दूर कर दिया है, जिससे शरीर के समस्त हड्डी के जोड़ व  मांसपेशियों के साथ तंत्रिका तंत्र भी शिथिल होता जा रहा है। जिसके कारण रक्त  परिसंचरण तंत्र, शवसन तंत्र, पाचन तंत्र, उत्सर्जन तंत्र, ज्ञान इन्द्विय तंत्र, जननेद्विय तंत्र व चिंतन तंत्र को दूषित कर दिया है। बाकी बचा हुआ नुकसान वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण ने शरीर में विसंगतियो को उत्पन्न कर पूरे मानव शरीर के सिस्टम को अस्त-व्यस्त कर दिया है और अधिकांश युवा अवस्था से ही किसी न किसी जटिल रोंग से (मधुमेह, ह्रदय, व सैक्स रोंग) जीवन यापन कर रहे हैं। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति जो बिना रसायनिक औषधियों पर या यूँ कहे बिना औषधियों पर आधारित है, उसका महत्ब दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। इसी उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक चिकित्सा का यह कोर्स तैयार किया गया है। इसको करके आप स्वयं को व परिवार को स्वास्थ्य प्रदान कर सकते है।

शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

संयोग विरुध आहार

*कुछ सूत्र जो याद रखे.....!* *एक साथ नहीं खानी चाहिए:*

⚫-चाय के साथ कोई भी नमकीन चीज नहीं खानी चाहिए। दूध और नमक का संयोग सफ़ेद दाग या किसी भी स्किन डीजीज को जन्म दे सकता है, बाल असमय सफ़ेद होना या बाल झड़ना भी स्किन डीजीज ही है।

⚫-सर्व प्रथम यह जान लीजिये कि कोई भी आयुर्वेदिक दवा खाली पेट खाई जाती है और दवा खाने से आधे घंटे के अंदर कुछ खाना अति आवश्यक होता है, नहीं तो दवा की गरमी आपको बेचैन कर देगी।

⚫-दूध या दूध की बनी किसी भी चीज के साथ दही ,नमक, इमली, खरबूजा, बेल, नारियल, मूली, तोरई, तिल ,तेल, कुल्थी, सत्तू, खटाई, नहीं खानी चाहिए।

⚫-दही के साथ खरबूजा, पनीर, दूध और खीर नहीं खानी चाहिए।

⚫-गर्म जल के साथ शहद कभी नही लेना चाहिए।

⚫-ठंडे जल के साथ घी, तेल, खरबूज, अमरूद, ककड़ी, खीरा, जामुन ,मूंगफली कभी नहीं।

⚫-शहद के साथ मूली , अंगूर, गरम खाद्य या गर्म जल कभी नहीं।

⚫-खीर के साथ सत्तू, शराब, खटाई, खिचड़ी , कटहल कभी नहीं।

⚫-घी के साथ बराबर मात्र1 में शहद भूल कर भी नहीं खाना चाहिए ये तुरंत जहर का काम करेगा।

⚫-तरबूज के साथ पुदीना या ठंडा पानी कभी नहीं।

⚫-चावल के साथ सिरका कभी नहीं।

⚫-चाय के साथ ककड़ी खीरा भी कभी मत खाएं।

⚫-खरबूज के साथ दूध, दही, लहसून और मूली कभी नहीं।

*कुछ चीजों को एक साथ खाना अमृत का काम करता है जैसे:*

⚫-खरबूजे के साथ चीनी

⚫-इमली के साथ गुड

⚫-गाजर और मेथी का साग

⚫-बथुआ और दही का रायता

⚫-मकई के साथ मट्ठा

⚫-अमरुद के साथ सौंफ

⚫-तरबूज के साथ गुड

⚫-मूली और मूली के पत्ते

⚫-अनाज या दाल के साथ दूध या दही

⚫-आम के साथ गाय का दूध

⚫-चावल के साथ दही

⚫-खजूर के साथ दूध

⚫-चावल के साथ नारियल की गिरी

⚫-केले के साथ इलायची

*कभी कभी कुछ चीजें बहुत पसंद होने के कारण हम ज्यादा बहुत ज्यादा खा लेते हैं। ऎसी चीजो के बारे में बताते हैं जो अगर आपने ज्यादा खा ली हैं तो कैसे पचाई जाएँ ----*

⚫-केले की अधिकता में दो छोटी इलायची

⚫-आम पचाने के लिए आधा चम्म्च सोंठ का चूर्ण और गुड

⚫-जामुन ज्यादा खा लिया तो ३-४ चुटकी नमक

⚫-सेब ज्यादा हो जाए तो दालचीनी का चूर्ण एक ग्राम

⚫-खरबूज के लिए आधा कप चीनी का शरबत

⚫-तरबूज के लिए सिर्फ एक लौंग

⚫-अमरूद के लिए सौंफ

⚫-नींबू के लिए नमक

⚫-बेर के लिए सिरका

⚫-गन्ना ज्यादा चूस लिया हो तो ३-४ बेर खा लीजिये

⚫-चावल ज्यादा खा लिया है तो आधा चम्म्च अजवाइन पानी से निगल लीजिये

⚫-बैगन के लिए सरसो का तेल एक चम्म्च

⚫-मूली ज्यादा खा ली हो तो एक चम्म्च काला तिल चबा लीजिये

⚫-बेसन ज्यादा खाया हो तो मूली के पत्ते चबाएं

⚫-खाना ज्यादा खा लिया है तो थोड़ी दही खाइये

⚫-मटर ज्यादा खाई हो तो अदरक चबाएं

⚫-इमली या उड़द की दाल या मूंगफली या शकरकंद या जिमीकंद ज्यादा खा लीजिये तो फिर गुड खाइये

⚫-मुंग या चने की दाल ज्यादा खाये हों तो एक चम्म्च सिरका पी लीजिये

⚫-मकई ज्यादा खा गये हो तो मट्ठा पीजिये

⚫-घी या खीर ज्यादा खा गये हों तो काली मिर्च चबाएं

⚫-खुरमानी ज्यादा हो जाए तो ठंडा पानी पीयें

⚫-पूरी कचौड़ी ज्यादा हो जाए तो गर्म पानी पीजिये

*अगर सम्भव हो तो भोजन के साथ दो नींबू का रस आपको जरूर ले लेना चाहिए या पानी में मिला कर पीजिये या भोजन में निचोड़ लीजिये ,८०% बीमारियों से बचे.

नवरात्रों में उपवास का महत्व

नवरात्रों में उपवास का महत्व
            भारत वर्ष मे सभी धर्मो मे उपवास को महत्वपूर्ण माना गया हैं। हिन्दु धर्म में वर्ष मे दो बार नवरात्र व महीने मे एकादशी अमावस्या व पूर्णिमा व्रत रखे जाते हैं, इसके अलावा कुछ लोग साप्ताहिक व्रत भी रखते हैं। उपवास दो शब्दो से मिलकर बना हैं, उप-ऊपर या समीप एवं वास-निवास करना अर्थात आत्म स्थित स्वं में स्थित होना उपवास हैं। उपवास के समय जीवनी शक्ति जो परमात्मा का अंश हैं बिना किसी रूकावट के सुचारू रूप से कार्य करती हैं तथा शरीर व मन दोनो की शुधि होती हैं।
        प्राचिन समय मे उपवास स्वास्थ्य प्राप्ति के लिये बनाये गये थें। फिर हमारें ऋषि मुनियों ने इन्हें धर्म के साथ जोंड़ दिया जिससे आस्था के साथ लोगो को स्वास्थ्य लाभ मिलता रहें, परन्तु आज के समय मे मनुष्य ने उपवास को स्वार्थ सिधि का साधन मान लिया हैं। साथ ही यह केवल परम्परा व रिवाज बन कर रहे गये हैं।
         क्योंकि आज उपवास के नाम पर कुटू आटा, आलू की पकोड़ी, इत्यादि गरिष्ट पदार्थ ओर अब तो फास्ट फूड भी सेवन किया जाता हैं, जिससे स्वास्थ्य खराब हो जाता हैं। स्वाद के लिये विभिन्न प्रकार के व्यंजन प्रयोग करे जाते हैं। परन्तु यदि हम स्वास्थ्य की दृष्टि से नवरात्रों का पालन करें तो दैवीय शक्ति तो प्राप्त होगी ही ओर शरीर का शोधन भी हो जायेगा
        हमारें ऋषि मुनियों ने उपवास को नवरात्रो के साथ इसी लिये जोंड़ा जिससे छः महीने तक भोजन करने से हमारे शरीर मे जो दूषित पदार्थ इक्ठठे होते हैं वह नौ दिन के उपवास से शरीर के बहार निकल जायें ओर शरीर उस विष से उत्पन्न होने वाले रोगो से बच जाये।
       ओर इन दिनो होने वाले हवन यज्ञ से घर का वातावरण भी शुद्ध हो जाता हैं तथा उपवास करने से शरीर के पाचन संस्थान को भी विश्राम मिल जाता हैं। जिससे पाचन अंगों को शक्ति प्राप्त होती हैं व उदर सबंधी सभी रोग ठीक हो जाते हैं ओर सात्विक विचारो की वृद्वि होती हैं जिससे हम अन्नत आंनद प्राप्त करते हैं व उस दैवीय शक्ति को प्राप्त कर अपनी इच्छाओ को भी पूरा कर लेते हैं।
       उपवास का सही तरीका केवल पानी का सेवन करना हैं यदि हमें उदर रोग हैं तो गर्म पानी का प्रयोग करें अगर कमजोरी, एनिमिया, शुगर, या बृद्व अवस्था हो तो या तो उपवास करे ही नही या किसी डाक्टर की देखरेख मे फलो का रस, फल, डाई फुट, आदि के उचित प्रयोग के द्वारा करे जिससे स्वास्थ्य भी प्राप्त हो एवं आंनद भी मिले।
       साथ में उचित विश्राम व शिथिलीकरण के साथ चिदआकाश धारणा के द्वारा दैवी की आराधना कर उसे प्रकट कर अध्यात्मिक लाभ प्राप्त करे एवं सत्य का अनुभव कर आनंद को प्राप्त करें ओर शारीरिक, मानसिक, आत्मिक शान्ति को प्राप्त हो।

                                                                    (स्वामी जगतेश्वर आनंद जी Mob.9958502499)